हर मौसम में आकर्षित करता रूमटेक

गंगटोक शहर सिक्किम राज्य में सबसे बड़ा शहर है. पूर्वी हिमालय रेंज में शिवालिक की पहाडिय़ों के ऊपर 1437 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगटोक सिक्किम जाने वाले पर्यटकों के बीच एक प्रमुख आकर्षण है. गंगटोक में और उसके चारों ओर पर्यटन स्थल है, इनमें शामिल हैं एंचेय मठ, नाथूला दर्रा, नामग्याल तिब्बत शास्त्र के संस्थान, ड्रल चोर्टन, गणेश टोक हनुमान टोक, सफेद दीवार, रिज गार्डन, हिमालय चिडिय़ाघर, पार्क एमजी मार्ग और लाल बाज़ार और रुमटेक मठ. आप गंगटोक वायु, रेल या सड़क मार्ग के माध्यम से गंतव्य तक पहुंच सकते हैं. रूमटेक घने जंगलों से घिरा हुआ एक शहर है जो सिक्किम की राजधानी गंगटोक शहर से 23 किमी की दूरी पर स्थित है. यह टाउन यहां स्थित रूमटेक मठ के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध है. रूमटेक मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है. रूमटेक की सैर करते हुए आप सिक्किम के कई गांवों और धान के खेतों से गुजरेंगे. यहां जुलाई से सितम्बर के महीने के दौरान धान के खेत मैदान में बिछी हरी कालीन की भांति दिखाई देते हैं. फसल पकने के दौरान इन खेतों का रंग सुनहरा हो जाता है और अक्टूबर से नवंबर के बीच इन फसलों की कटाई शुरू हो जाती है.
साहसिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध रूमटेक
बर्फ  से ढकी पहाडिय़ों के सांस थाम लेने वाले दृश्य और हरियाली भरे जंगल, इसकी प्राकृतिक रमणीयता में चार चांद लगाते हुए पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं. रूमटेक शहर आगंतुकों को अच्छे – अच्छे पर्यटन स्थलों पर सैर करने का अवसर प्रदान करता है और पर्यटक यहां आकर एक दिन के टूर में आसपास के क्षेत्रों में भी भ्रमण कर सकते हैं. साहसिक गतिविधियों में रूचि रखने वाले पर्यटक यहां आकर रिवर राफ्टिंग और ट्रैकिंग जैसी एक्टिीविटी में हिस्सा ले सकते हैं.
रूमटेक के पर्यटन आकर्षण
रूमटेक का सबसे मुख्य आकर्षण रूमटेक मठ है. यह मठ एक पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है जो पास में स्थित गंगटोक शहर का शानदार नजारा प्रदान करती है. पीक सीजन के दौरान इस मठ पर जाकर पर्यटकों को बौद्ध संस्कृति के बारे में अधिकाधिक जानकारी मिलती है. कई बौद्ध तीर्थयात्री इस दौरान ही मठ की यात्रा करने आते हैं. इसके अलावा रूमटेक में जवाहर लाल नेहरू बॉटनिकल गार्डन है ,जो रूमटेक मठ के पास ही स्थित है. पौधों और हिमालयी फूलों की कई किस्में यहां पाई जाती हैं. इस बगीचे का रखरखाव  सिक्किम पर्यटन के वन विभाग के द्वारा किया जाता है.
पूर्वोत्तर भारत में बिताएं एकांत के पल पर्यटन के मामले में बेहद समृद्ध मंगन उत्तर सिक्किम  जिला का मुख्यालय है. उत्तर सिक्किम क्षेत्रफल के मामले में सबसे बड़ा जिला है और मंगन इस जिले के दक्षिणी भाग में पड़ता है. यह शहर गंगटोक से 67 किमी दूर है और यह आस पास के जगहों से भी अच्छे से जुड़ा हुआ है. मंगन हर साल 12 से 14 दिसंबर तक आयोजित होने वाले तीन दिवसीय संगीत उत्सव के लिए जाना जाता है. इसके अलावा मंगन फूड फेस्टिवल परंपरागत संगीत और स्थानीय हस्तशिल्प की बिक्री के लिए भी प्रसिद्ध है. ये सब आपस में मिलकर इस शहर को और भी रोचक बना देते हैं. इस क्षेत्र के अलावा पड़ोसी राज्य के म्यूजिक बैंड भी इस उत्सव में भाग लेते हैं. ठंड के मौसम में जब फिजा में संगीत घुलता है तो माहौल बहुत ही दिलकश हो जाता है.
मंगन की भाषाएं
अगर कोई नेपाली या तिब्बती मंगन घूमने आए तो भाषा उनके लिए बाधा नहीं बनेगी. इसकी वजह यह है कि नेपाली व भूटिया सहित अन्य कई भाषाएं मंगन की अधिकृत भाषा है. सिक्किम के अन्य जगहों के उलट यहां के निवासी कई तरह की भाषाएं बोलते हैं.
भूगोल
समुद्र तल से 3236 फिट की ऊंचाई पर स्थित मंगन तिब्बत पठार का प्रवेशद्वार भी है. यह पठार तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र के बहुत बड़े भाग के अलावा पश्चिमी चीन के किंघाई प्रांत और जम्मू कश्मीर के लद्दाख तक फैला हुआ है. साथ ही सुदूर उत्तर में मंगन का फैलाव लाचुंग चुंगथांग और लाचेन तक है.
प्रसिद्ध : गर्म पानी के झरने
          चाय बागान और रोमांच
भाषा : बंगाली, भूटिया, नेपाली, हिन्दी, इंग्लिश
सबसे अच्छा मौसम : मार्च से मई
एक छोटा शानदार शहर  रवंगला
पेलिंग और गंगटोक के बीच स्थित रवंगला दक्षिण सिक्किम में एक सुंदर जगह है, जहां दुनिया भर से पर्यटक बार.बार आते हैं. यह समुद्र से 7000 फीट की ऊंचाई पर है. शहर का जन्म स्थानीय किसानों के छोटे से व्यापार बाजार से हुआ जो अदरक और बड़ी इलायची की तरह नकदी फसलों का उत्पादन करते थे. शहर में हाल के समय में व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में भारी वृद्धि देखी गई है. मोटी वनाच्छादित पहाडिय़ों और सुंदर चाय बागानों के साथ रवंगला उन लोगों के लिए स्वर्ग है जो प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेना चाहते हैं. यह वह जगह है जहां आप शहर के कोलाहल से बच कर ग्रामीण जीवन का आनंद ले सकते हैं. रवंगला में बोरोंग और रालोंग गर्म पानी का झरना, बुद्ध पार्क, टेमी चाय बागान और कीवजिंग गांव कुछ नाम हैं जिन स्थानों पर पर्यटक बार-बार जाते हैं.
रवंगला उन लोगों के लिए एक सुंदर गंतव्य है जो पहाडिय़ों के ऊपर ट्रेकिंग करने की इच्छा रखते हैं. यह जगह घने जंगलों से घिरी हुई है और पहाडिय़ां इस जगह को स्वर्ग बनाती हैं. प्रवासी पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों और माउंट कंचनजंगा, माउंट पंदिम और माउंट सिनियल्चू जैसी चोटियों के लुभावने दृश्यों को देखने के लिए पर्यटक यहां इकठ्ठा होते हैं. गांव की छोटी यात्रा भी की जा सकती है क्योंकि रवंगला, यनगंग, तिनकितम, कीजिंग, बरफंग और बखिम जैसे कुछ लेपचा और भूटिया गांवों के करीब है.
संस्कृति एवं समारोह
रवंगला अपनी विशिष्ट संस्कृति और त्योहारों के लिए जाना जाता है. अप्रैल के महीने में रवंगला में स्थानीय लोग अपने पर्यटन शिल्प और सांस्कृतिक उत्सवों का जश्न मनाते हैं. इस समय एक और त्योहार पंग लबसोल अगस्त और सितंबर के महीने में मनाया जाता है. यह तीन दिन तक चलने वाला एक त्योहार है जो आखिरी दिन श्रम नृत्य के प्रदर्शन के साथ संपन्न होता है. रवंगला हवाई, रेल और सड़क मार्ग द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है. रवंगला में मौसम बहुत ही प्रचंड सर्दियों के अलावा साल भर सुखद रहता है.

चश्मे बद्दूर

कलाकार: अली जाफ र, दिव्येंदू शर्मा, सिद्धार्थ नारायण, तापसी पन्नू, ऋषि कपूर, लिलिट दूबे, अनुपम खेर
निर्माता व निर्देशक : डेविड धवन
गीत : नीलेश मिश्रा, कौसर मुनीर,
संगीत :साजिद.वाजिद
अस्सी का दशक उस दौर की याद दिलाता है, जब फैमिली क्लास ने सिनेमाघरों से दूरी बनाई . इसी दौर में शुरू हुआ सिंगल स्क्रीन पर ताले लगने का दौर अभी भी थमा नहीं है . ट्रेड ऐनालिस्ट इस दौर को ग्लैमर इंडस्ट्री का बुरा वक्त मानते हैं . पिछले हफ्ते इसी दशक में रिलीज़ हुई हिम्मतवाला के रीमेक को दर्शकों और क्रिटिक्स ने धो दिया .
डेविड धवन ने भी इसी दौर में रिलीज हुई सई परांजपे की फिल्म के सीक्वल को हाल में हीे रिलीज़ किया है. सई नहीं चाहती थीं कि उनकी फिल्म को एकबार फि र नए सिरे से बनाया जाए . लेकिन प्रॅाक्शन कंपनी ने सई की इच्छा को दरकिनार करके डेविड को इस फिल्म को नए सिरे से बनाने का ग्रीन सिग्नल दिया . ऐसा पहली बार होगा जब किसी मल्टिप्लेक्स में इसी टाइटल से बनी सई और डेविड धवन की दोनों फिल्में एक साथ चल रही होंगी .
वैसे अगर आपने डेविड की कुली नंबर वन, राजा बाबू और रास्कल्स वगैरह कोई फिल्म पहले से देखी है तो यकीनन आप डेविड की पूरी फिल्म तो दूर इस फिल्म के किसी एक सीन का मुकाबला भी सई की फिल्म से नहीं करेंगे . बॉलिवुड में डेविड अपने शुरुआती दौर से ही लोग कहते आए हैं कि उनकी फिल्म देखने जा रहे हैं तो दिमाग घर रखकर जाएं .
कहानी फिल्म की कहानी तीन दोस्तों के इर्द.गिर्द घूमती है . गोवा की एक छोटी सी बस्ती में सिड , अली जाफर, जय, सिद्धार्थ नारायण और ओमी , दिव्येंदू शर्मा एक साथ रहते हैं . कहने को तो तीनों पक्के दोस्त हैं लेकिन बात जब लड़की की हो तो ओम और जय बाजी मारने के लिए आगे हो जाते है . खूबसूरत लड़कियों का पीछा करना ओमी और जय की पुरानी आदत है . एक दिन जब इनके पड़ोस में एक खूबसूरत लड़की सीमा (तापसी पन्नू) रहने आती है तो जय और ओमी दोनों उसे अपना बनाने में लग जाते हैं . दरअसल सीमा अपने घर से भागकर अंकल (अनुपम खेर) के पास रहने आई है . सीमा के पिता सेना में आला अफसर है और अपनी बेटी की शादी किसी सिविलियन से करने को राजी नहीं है . सीमा सिद्धार्थ की तरफ  आकर्षित होने लगती है . सीमा और सिद्धार्थ की बढ़ती नजदीकियों को देख जय और ओमी इनके बीच दरार डालने में लग जाते हैं और सिद्धार्थ की नजरों में सीमा की इमेज गिराने के लिए रोज नई.नई चालें चलते हैं . इस कहानी के साथ साथ फिल्म में जोसफ  (ऋषि कपूर) और ललित दूबे की लव स्टोरी भी चलती है जो दर्शकों को बांध नहीं पाती.
ऐक्टिंग अली जाफर सिद्धार्थ और दिव्येंदू शर्मा की तुलना पिछली फिल्म के कलाकारों फारूख शेख, रवि वासवानी और राकेश बेदी से करना बेमानी होगा . अगर इस कसौटी पर इनकी ऐक्टिंग को परखा जाए तो अली जाफर को छोड़ हर कोई निराश करता हैं . वैसे भी डेविड अपनी फिल्मों में कलाकारों को अपने ढंग से ऐक्टिंग करने की छूट देते हैं . यही वजह है कि सिद्धार्थ और दिव्येंदू और अनुपम खेर लाउड डायलॉग डिलिवरी और ओवर ऐक्टिंग के शिकार हैं . जाफर कुछ सीन में प्रभावित करते हैं . ऋ षि कपूर ने किस मजबूरी में इस फिल्म को किया यह तो वही बता सकते हैं . लिलत दूबे ने वही किया जो उन्हें करने के लिए दिया गया . न्यूकमर तापसी पन्नू के चेहरे की मासूमियत देखने लायक है . निर्देशन डेविड धवन बरसों से जैसा करते आए हैं , इस बार भी उन्होंने वही कुछ दोहराया है . डेविड के काम करने का स्टाइल यंग डायरेक्टरों की सोच से अलग है . वह ऐसी फिल्म बनाते हैं , जिसमें कोई कुछ भी कर सकता है . यही सब इस फिल्म में भी है . संगीत इस फिल्म का गाना हर एक फ्रेंड कमीना होता है, रिलीज से पहले कई म्यूजिक चार्ट में टॉप फाइव में शामिल हो चुका है . अंधा घोड़ा रेस में दौड़ा गाने का फिल्मांकन अच्छा बन पड़ा है .क्यों देखें अगर कोई और विकल्प नहीं है और बस टाइम पास करना है तो फिल्म देखी जा सकती है। हं तर्क-वितर्क करने या लीक से हटकर बनी फिल्मों के शौकीन इस चालू कॉमिडी से दूर ही रहें.

समय पर ही होंगे आम चुनाव

भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि आगामी मई तक लोकसभा चुनाव की घोषणा हो जानी है . इसी तरह समाजवादी पार्टी के सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव भी मान कर चल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव की घोषणा आने वाले दिनों में कभी भी हो सकती है. हालांकि इसके विपरीत केन्द्रीय वित्त मंत्री पी.चिदम्बरम का कहना है कि लोकसभा चुनाव मई 2014 के पहले नहीं होने वाले हैं. देश के इन शीर्ष नेताओं के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में दिये जा रहे विरोधाभासी बयानों से जनता में राष्ट्रीय राजनीति को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनती नजर आ रही है. इसका जाने-अनजाने प्रभाव देश की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता नजर आ रहा है. हालांकि यह एक तथ्य है कि समस्त मानवीय गतिविधियां ग्रहों और नक्षत्रों के संचलन से प्रभावित हो कर ही क्रिया-प्रतिक्रिया करती हैं. इसे हर व्यक्ति भले न स्वीकारता हो,मगर यह किसी से छिपा नहीं है कि भारतीय राजनीति के तमाम धुरंधर ज्योतिष में न केवल अटूट विश्वास रखते हैं बल्कि राजनीतिक सफलताओं के लिए तंत्र-मंत्र एवं पूजा-पाठ तक का सहारा लेते आ रहे हैं. वैसे भी ग्रह ही व्यक्ति को अर्श से फर्श और फर्श से अर्श तक पहुंचाते हैं. ज्योतिषीय गणना के अनुसार भारत का जन्म बृष लग्न में हुआ है और इस समय इसकी सूर्य की महादशा में शनि की अंतर्दशा चल रही है, जो तीस जून दो हजार तेरह तक रहेगी. ज्योतिष की हलकी- फुलकी जानकारी रखने वाले भी यह जानते हैं कि सूर्य और शनि में तालमेल नहीं रहता है. ऐसे में जाहिर है कि इस बीच लोकसभा चुनाव की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है.यह अवश्य है कि मौजूदा समय राजनैतिक संक्रमण का है, जिसमें अगले आमचुनाव को लेकर विभिन्न दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप बढ़ेंगे, राजनीतिक गतिविधियां तेज होंगी और नये राजनीतिक समीकरणों की दिशा में नये-नये शगूफे भी लोगों को सुनने को मिलेंगे. मगर तीस जून तेरह से छह मई 2013 तक सूर्य की महादशा में बुद्ध की अंतरदशा चलेगी. सूर्य व बुद्ध के बीच अच्छा तालमेल और समन्वय के कारण बुद्धादित्य का साधारण राजयोग भी बनता है. इससे इस बात की प्रबल संभावना बनती है कि इस बीच आमचुनाव कराने की पृष्ठभूमि बने. उधर तीन दिसम्बर 2013 से 20 दिसम्बर 13 तक मंगल की प्रत्यंतर दशा और 6 फरवरी 2014 तक राहु की प्रयंन्तर दशा रहेगी. राहु राजनीति का प्रमुख कारक ग्रह माना जाता है. इसलिए यही वह समय है,जब देश में आम चुनाव की घोषणा हो सकती है. इससे स्पष्ट है कि फरवरी 2014 से जून 2014 के बीच आमचुनाव होने की ज्यादा उम्मीद है.

कर्नाटक में होगा बीजेपी का पत्ता साफ

पिछले विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार कर्नाटक में अपनी सरकार बना कर दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनायी थी . इस सफलता में तत्कालीन भाजपा के छत्रप बीएस येदिद्दुरप्पा का काफी बड़ा योगदान था . आज की तारख में येदिद्दुरप्पा भाजपा की जड़ में म_ïा डाल रहे हैं . जबकि राज्य में 5 मई को विधानसभा चुनाव होने हैं . इससे पूर्व हुए स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा यहां करारी शिकश्त खा चुकी है. बावजूद इसके भाजपा के रणनीतिकार अपनी शाख बचाने के लिए राज्य में जोर-शोर से भ्रष्टïाचार विरोधी अभियान चला रही है . मगर हाल में हुए एक सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर यदि यदि यकीन किया जाय तो विधान सभा चुनाव में भाजपा का सफाया होने जा रहा है.
‘हेडलाइंस टुडे और सी.वोटरÓ द्वारा चुनाव पूर्व किये गये सर्वे में यह बात सामने आई है कि विधानसभा चुनावों में बीजेपी को मुंह की खानी पड़ सकती है . मतदाताओं को ऐसा लगता है कि अगर नरेंद्र मोदी को प्रचार अभियान में उतारा जायेगा तो कुछ बात बन सकती है .जनवरी और मार्च में हुए चुनाव पूर्व सर्वे के मुताबिक बीजेपी की सीट 110 से घटकर 52 तक पहुंच सकती है, वहीं सर्वे के मुताबिक कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है . सर्वे के अनुसार कांग्रेस को 38 सीट की बढ़त मिलने की संभावना है . कांग्रेस के पाले में 118 सीटें आ सकती हैं ,जो कि 2008 में बीजेपी को मिली सीट से आठ ज्यादा है. इन सब में सबसे रोचक बात यह है कि 64 प्रतिशत लोगों का मानना है कि नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता कर्नाटक में बीजेपी की खोई जगह को फिर बना सकता है . हेडलाइंस टुडे व सी वोटर सर्वे कर्नाटक के 224 विधानसभा क्षेत्रों में 15 हजार लोगों के बीच किया गया. बीजेपी के लिए अभिशाप बने बीएस येदिदुरप्पा की कर्नाटक जनता पार्टी के पक्ष में आठ प्रतिशत निर्णायक वोट है हालांकि इन आंकड़ों से वह नई विधानसभा में महज 12 सीटें जीतती दिखाई दे रही है और यह बीजेपी के लिए एक झटका होगा .
एचडी देवगौड़ा की जनता दल (सेक्यूलर) अभी भी वर्ष 2008 के आंकड़ों में ही फंसा हुआ है . सर्वे के मुताबिक पार्टी को 19 सीटें मिल सकती हैं . सर्वे के मुताबिक कांग्रेस को कर्नाटक में एक बड़ी जीत मिलने की संभावना है . उत्तर-पूर्व और हिमाचल में आसान जीत के बाद यहां कांग्रेस के हिस्से में महज एक प्रतिशत वोट की कमी आ सकती है, वहीं बीजेपी का वोट प्रतिशत 34 से घटकर 28 फीसदी हो सकता है. ऐसे में उसके वोट में 6 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. सर्वे में सबसे रोचक बात यह है कि 40 प्रतिशत लोग मानते हैं कि अगर बीजेपी कर्नाटक में हारती है तो उसकी बड़ी वजह भ्रष्टाचार होगी. 62 प्रतिशत लोगों का मानना है कि बीजेपी पिछली सरकारों की तुलना में बेहतर शासन प्रदान करने में विफल रही है. इससे साफ संकेत मिलते हैं कि येदियुरप्पा बीजेपी के लिए दक्षिण का दरवाजा बंद करने में सफल हो सकते हैं .

एजूकेशनल हब बन रहा गोरखपुर

वर्तानियां हुकूमत के दौर से लेकर अब तक औद्योगिक पिछड़ेपन का दंश झेल रहे पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रमुख शहर गोरखपुर अपनी जिजीविषा के बूते बड़ी तेजी से शैक्षणिक केन्द्र(एजूकेशनल हब) के रूप में उभर रहा है. सन् 1952 तक जिस शहर में मात्र एक महाविद्यालय था, वहीं बासठ वर्षों के अन्तराल में शिक्षा के क्षेत्र में इस शहर ने उल्लेखनीय प्रगति की है. यह शहर आज की तारीख में सूबे के शैक्षणिक केन्द्र इलाहाबाद, वाराणसी, कानपुर तथा राजधानी लखनऊ के समक्ष सीना तान कर खड़ा है. यहां पेश है वीरेन्द्र मिश्र दीपक की रिपोर्ट….
पूर्वी उत्तर प्रदेश की शैक्षिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक राजधानी कहा जाना वाला गोरखपुर शहर खासकर शिक्षा का बड़ा केन्द्र होने की ओर अग्रसर है. सन् 1952 में जब गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, तब इस शहर में उच्च शिक्षा के लिए एकमात्र महाविद्यालय सेन्ट एन्ड्रयूज डिग्री कालेज था, जो आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध था. इसके अलावा तत्कालीन गोरखपुर मंडल में गिने-चुने ही उच्च शिक्षा के लिए शिक्षण संस्थाएं थीं. विश्वविद्यालय  स्थापित होने के बाद आज की तारीख में दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से 354 डिग्री कालेज संबद्ध हैं. इनमें 31 अनुदानित तथा 13 राजकीय महाविद्यालय हैं. बीआरडी मेडिकल कालेज घटक के रूप में इस विश्वविद्यालय से संबद्ध है. विश्वविद्यालय पर उत्तरोत्तर बढ़ रहे कार्य बोझ और इस इलाके के प्रतिभा पलायन पर रोक लगाने के लिए इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग काफी जोर-शोर से हो रही है. केन्द्र सरकार ने जनहित में यदि इस मांग को मान लिया तो वह दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. शहर का मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज भी पहले इसी विश्वविद्यालय से संबद्ध था,जो बाद में टेक्निकल विश्वविद्यालय से संबद्ध हो गया. उत्तर प्रदेश सरकार ने 2013-14 के बजट में इस इंजीनियरिंग कालेज को भी रुड़की टेक्निकल विश्वविद्यालय की तरह विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा की है. प्रदेश सरकार इस कोशिश में है कि आगामी शैक्षणिक सत्र से ही इस विश्वविद्यालय को औपचारिक रूप से शुरु कर दिया जाए. इसके लिए जरूरी औपचारिकता पूरी करने का कार्य काफी तेजी से हो रहा है. इंजीनियरिंग कालेज के विश्वविद्यालय बनते ही गोरखपुर की धरती को जहां दो-दो विश्वविद्यालयों की मल्लिका बनने का गौरव हासिल होगा, वहीं इस क्षेत्र के विकास को पंख लगने में देर नहीं लगेगी. यहां एक और बात काबिल-ए-गौर है कि बीआरडी मेडिकल कालेज को एम्स का दर्जा दिलाने का प्रस्ताव भी केन्द्र सरकार को भेजा जा चुका है. क्षेत्रीय जनता का यह भी सपना साकार हो गया तो क्या कहने? यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गोरखपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध 309 डिग्री कालेज ऐसे हैं, जो स्व वित्त पोषित आधार पर चल रहे हैं. जहां तक गोरखपुर शहर की बात है, यहां सेन्ट एन्ड्रयूज डिग्री कालेज, डीएवी डिग्री कालेज, इमामबाड़ा डिग्री कालेज, एम. जी. डिग्री कालेज और दिग्विजय नाथ डिग्री कालेज को मिलाकर कुल पांच महाविद्यालय अनुदानित हैं. इसके अलावा गोरखपुर शहर और इसके आसपास के इलाकों में 13 स्व वित्त पोषित डिग्री कालेजों के जरिए शिक्षा की अलख विश्वविद्यालय जगा रहा है. तकरीबन पांच हजार छात्र संख्या से अपनी शैक्षणिक यात्रा शुरु करने वाले इस विश्वविद्यालय में आज यूपी, बिहार, नेपाल तथा समीपवर्ती जिलों के बीस हजार से ज्यादा छात्र अध्ययन कर रहे हैं. अपने 25 विभागों में बेहतर पढ़ाई के जरिये गोरखपुर विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रमों और नियमित शैक्षणिक सत्र की वजह से उत्तरोत्तर विकास कर रहा है.
सन् 1952 में जब गोरखपुर में विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई तो तत्कालीन केन्द्र सरकार के मुखिया पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे ग्रामीण विश्वविद्यालय की संज्ञा देते हुए कहा था कि यह विश्वविद्यालय पूर्वी उत्तर प्रदेश के शैक्षिक जगत में मील का पत्थर साबित होगा. उन्होंने इस क्षेत्र की जरूरत को महसूस करते हुए आश्वस्त किया था कि पचास वर्ष के बाद इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय बना दिया जाएगा. इसके बाद केन्द्र और राज्य में तमाम सरकारें आईं और गईं, मगर किसी ने भी इस जनोपयोगी मसले पर अमल को कौन कहे, विचार तक करने की जरूरत नहीं समझी. इसके लिए नक्कारखाने में तूती की तरह दब चुकी गोरखपुर की आवाज को सबसे पहले 25-11-2011 को विश्वविद्यालय के ललित कला एवं संगीत विभाग के अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार ने स्वर दिया. उन्होंने इस ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनी तरह का एक अनूठा आंदोलन छेड़ा. उन्होंने सूर्योदय से सूर्यास्त तक अनवरत पेंटिंग बनाकर लोगों को इस मुहिम से जोडऩे का जो प्रयास किया, उसकी जितनी भी सराहना की जाए कम है. इसी के साथ विश्वविद्यालय के शिक्षकों-कर्मचारियों ने एकजुट होकर व्यापक हस्ताक्षर अभियान चलाया, जिसमें शामिल होकर 21 सौ ज्यादा लोगों ने केन्द्रीय विश्वविद्यालय की मांग के पक्ष में हस्ताक्षर किए. शिक्षकों-कर्मचारियों और दिनोदिन बढ़ रहे जन दबाव की वजह से विश्वविद्यालय की कार्य परिषद और विद्या परिषद ने प्रस्ताव पारित कर प्रदेश तथा केन्द्र सरकार के कई फोरमों पर विचार और कार्यवाही के लिए भेजा, फिर भी कोई हल नहीं निकला.
प्रारंभिक तौर पर यह प्रो. मनोज कुमार द्वारा जगाए गए अलख का ही कमाल था कि कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष डा. वी. एन. सिंह तथा पूर्व अध्यक्ष रामेश्वर पाण्डेय, पूर्व उपाध्यक्ष फणेश तिवारी एवं पूर्व महामंत्री महेन्द्र नाथ सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय कर्मचारियों के एक जत्थे ने 9 जुलाई 2012 को नई दिल्ली जाकर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से मुलाकात करके अपना मांग पत्र उन्हें सौंपा. बताया तो यहां तक जा रहा है कि राहुल गांधी ने इस मांग पत्र को मानव संसाधन विकास मंत्रालय को विचारार्थ भेजा, जहां से उसे योजना आयोग भेजा जा चुका है. वहीं इस संदर्भ में बातचीत के दौरान प्रो. मनोज कुमार ने बताया कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय के मसले पर योजना आयोग में बैठक हुई, जिसमें आयोग का रुख काफी सकारात्मक रहा. आयोग ने इस मांग के संदर्भ में फिलहाल इतना कहा कि विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय जैसी सुविधा तो दी जा सकती है, लेकिन अभी उसे इस नाम से नवाज पाना थोड़ा मुश्किल है. प्रो. मनोज कुमार इसे इस विश्वविद्यालय के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि करार देते हुए कहते हैं कि यह केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने की ओर बढ़े कदम का एक पड़ाव है. उनका मानना है कि अब मंजिल दूर नहीं है. गोरखपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने को लेकर भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ तथा डुमरियागंज के कांग्रेस सांसद जगदंबिका पाल ने कम प्रयास नहीं किया. योगी जी ने संसद में इस मसले को तीन-तीन बार उठाकर सरकार से जवाब मांगा, वहीं जगदंबिका पाल ने दिनांक 12-11-11 को अपनी ही सरकार पर दबाव बनाते हुए कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश को शैक्षिक पिछड़ेपन से उबारने के लिए इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देना निहायत जरूरी है. इसके अलावा विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी इस मामले का मांग पत्र सोनिया गांधी के अलावा केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और जितिन प्रसाद, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भी सौंप चुके हैं. कर्मचारी नेता रामेश्वर पाण्डेय का कहना है कि वे होली के बाद इस मसले पर छात्र संघ के पूर्व और वर्तमान पदाधिकारियों, शिक्षकों और शिक्षक नेताओं तथा कर्मचारी संघ के नेताओं की साझा बैठक में अगली रणनीति पर विचार करेंगे. उन्होंने कहा कि चालू वर्ष में विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा दिलाने के लिए चरणबद्ध आंदोलन चलाया जाएगा. इसके तहत सभी माननीय सांसदों-विधायकों को पत्र भेजने, धरना, जनसभाओं के जरिए लोगों को जागरूक करने, मांग नहीं माने जाने पर काली पट्टी बांधकर विरोध जताने तथा मशाल जुलूस निकालने के कार्यक्रम होंगे, जिसे संघ की नई कार्यकारिणी के पदाधिकारियों ने नेतृत्व में अंजाम तक पहुंचाया जाएगा. कर्मचारी नेताओं का कहना है कि यह मुद्दा शिक्षकों-कर्मचारियों के साथ ही क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ा है. इसे हासिल किए बगैर चैन से नहीं बैठना है.
केन्द्रीय विश्वविद्यालय         से क्या होगा फायदा?
दीनदयाल गोरखपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने को लेकर विगत दो वर्षों से जो जद्दोजहद चल रही है. यहां सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश के अति पिछड़े इलाके में स्थापित उच्च शिक्षा का यह महत्वपूर्ण केन्द्र यदि केन्द्रीय विश्वविद्यालय के नाम से नवाज दिया जाता है, तो उससे फायदा क्या मिलेगा? इस संबंध में बातचीत के दरम्यान विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष रामेश्वर पाण्डेय एवं डा. वी. एन. सिंह देवरिया के भाटपार रानी उपनगर का हवाला देते हुए कहते हैं कि जब तक वहां महाविद्यालय नहीं खुला था, तब तक उस उपनगर का कोई खास विकास नहीं हुआ था. महाविद्यालय खुलने के बाद वहां हुए विकास इस मामले में किसी की भी आंख खोलने के लिए काफी है.
कर्मचारी नेताओं ने कहा कि यह सही है कि विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतनमान का निर्धारण केन्द्र सरकार द्वारा गठित वेतन आयोग करता है और उसी की सिफारिश पर राज्य सरकार अपने अधीनस्थ विश्वविद्यालय के शिक्षकों-कर्मचारियों को वेतन भुगतान करती है. केन्द्र द्वारा संस्तुत वेतनमान के हिसाब से वेतन आहरित कर पाने में कर्मचारियों के हाथ में अक्सर निराशा इसलिए लगती है, क्योंकि केन्द्र सरकार संस्तुत वेतनमान का आधा हिस्सा राज्य सरकार को तभी मुहैया कराती है, जब राज्य सरकार अपने हिस्से का धन वेतन मद में आवंटित कर देती है. ऐसे में राज्य और केन्द्र की राजनीतिक चक्की में राज्याधीन विश्वविद्यालय के कर्मचारी और शिक्षक दोनों पिस रहे हैं, जिसका कोई पुरसाहाल नहीं है. इन नेताओं का कहना है केन्द्रीय विश्वविद्यालय बन जाने से इस समस्या से निजात मिल जाएगी. साथ ही केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने के साथ ही इस इलाके को एक और मेडिकल कालेज मिल जाएगा, जिससे संक्रामक बीमारियों से सर्वाधिक तबाह रहने वाले पूर्वांचल को काफी राहत मिलेगी. ललित कला एवं संगीत विभाग के अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार ने इस बारे में पूछने पर बताया कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय बन जाने पर सर्वाधिक फायदा यहां के छात्रों को मिलेगा. उनकी फीस करीब-करीब आधी हो जाएगी, साथ ही तमाम तरह के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई शुरु होने से युवाओं को रोजगार के लाले नहीं रहेंगे. प्रो. मनोज कुमार कहते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में मेधा की कमी नहीं है. कमी है, तो बस उन्हें संवारने की. केन्द्रीय विश्वविद्यालय बन जाने पर इलाके के जो मेधावी छात्र बाहर जाकर अपना भविष्य संवारते हैं, उस पर रोक लगेगी और प्रतिभाओं का पलायन रुकेगा.
मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज, गोरखपुर
मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज, गोरखपुर के प्राचार्य जे.पी. सैनी प्रदेश के बजट में कालेज को विश्वविद्यालय बनाए जाने की घोषणा से अत्यन्त प्रसन्न हैं. बातचीत के दौरान वे कहते हैं कि ऐसा पहली बार मैने देखा है, जब किसी मुख्यमंत्री ने दलगत भावना से ऊपर उठकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की पीड़ा से खुद को जोड़ा है. वह कहते हैं कि तकनीक ऐसी चीज है, जिससे किसी भी समस्या का समाधान मिल सकता है. उत्तर प्रदेश के विकास में रुड़की विश्वविद्यालय का अमूल्य योगदान रहा है. रेजीडेंशियल रूप से इस कालेज के विश्वविद्यालय बन जाने के बाद एग्रीकल्चर, सुगर, एनवायरमेंट, केमिकल, आर्किटेक्चर, टाउन प्लानिंग तथा बायोलोजिकल सेक्टर में जो काम होंगे, उससे पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास को पंख लग जाएंगे. साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश की तमाम प्रतिभाएं, जो अध्ययन के लिए बाहर जा रही हैं, यहीं रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण करके देश की सेवा कर सकेंगी. डा. सैनी का कहना है कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय टेक्निकल कन्सल्टेंसी के रूप में सूबे के लिए कुछ सार्थक कर पाए, हमारा यही प्रयास रहेगा. इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए टेक्निकल इनपुट दिलाना हमारी प्राथमिकता में होगा.
अपनी बातचीत को विस्तार देते हुए क्यूबा जैसे छोटे देश का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि वहां की अर्थव्यवस्था में गन्ने की फसल का काफी महत्वपूर्ण योगदान है. पूर्वी उत्तर प्रदेश, जिसे चीनी का कटोरा कहा जाता है, उसके क्षेत्रफल से भी छोटा है क्यूबा. पूर्वी उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल की जो दुर्गति है, वह किसी से छिपी नहीं है. यह विश्वविद्यालय सुगर टेक्नालाजी के क्षेत्र में न केवल नये मानदंड स्थापित करेगा, बल्कि नई तकनीक के जरिये इस क्षेत्र को क्यूबा की बराबरी पर लाने की हरसंभव कोशिश करेगा, जिसका सीधा लाभ हमारे किसानों को होगा.
   विश्वविद्यालय बनाने की वाबत पूछे गए एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इसके लिए जो अधिनियम पास होना है, उसका ड्राफ्ट प्रमुख सचिव प्राविधिक शिक्षा को भेज दिया गया है. उम्मीद है कि आगामी जून माह से पहले ही अधिनियम का अनुमोदन हो जाएगा. इसी के साथ आगामी सत्र से यह कालेज विश्वविद्यालय के रूप में कार्य करने लगेगा. उन्होंने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जो खुद भी इंजीनियर हैं, विशेष रुचि लेकर इस कार्य की मानीटरिंग कर रहे हैं. एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए नौ सौ करोड़ का प्लान बनाकर भेजा गया है. नये विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 450 पद होंगे. अगले दस वर्षों के दरम्यान रुड़की विश्वविद्यालय की तरह यहां कुल सत्रह विभागों की पढ़ाई शुरु हो जाएगी. कालेज के पास अभी सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रानिक्स एंड सिविल इंजीनियरिंग, मकैनिकल इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग समेत कुल पांच विभाग ही हैं. कालेज में इस समय बीटेक में 1350 और एमटेक में 350 छात्र अध्ययनरत हैं. विश्वविद्यालय खुल जाने के उपरान्त बीटेक में 6000 तथा एमटेक में 800 छात्र हो जाएंगे. डा. सैनी ने विश्वास जताया कि यह विश्वविद्यालय देश के नवनिर्माण में अपनी उल्लेखनीय भूमिका पूरी जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ निभाएगा.
बीआरडी मेडिकल कालेज
बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. के.पी. कुशवाहा ने मेडिकल कालेज को एम्स का दर्जा देने के लिए सवा दो सौ करोड़ का प्रस्ताव बनाकर प्रधानमंत्री को भेजा है. उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली स्थित आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट पर बढ़ रहे मरीजों के बोझ को कम करने तथा देश के सुदूरवर्ती इलाकों के लोगों को भी एम्स की चिकित्सा सुविधा का लाभ दिलाने के लिए छह नये एम्स खोलने का मन बनाया है,जिन्हें तीन चरणों में स्थापित करने की योजना है. डाक्टर कुशवाहा ने बताया कि मेडिकल कालेज में 100 सीटों वाले नर्सिंग स्कूल खोलने का भी प्रस्ताव भेजा गया है, जिसे विश्वविद्यालय से पास होने और उसके लिए जरूरी पदों के अनुमोदन के साथ ही उसकी भी पढ़ाई शुरु हो जाएगी. अक्सर मेडिकल कालेज की मान्यता को लेकर पैदा होने वाले विवाद की वाबत पूछे गए सवाल के जवाब में डा. कुशवाहा ने कहा कि कालेज में डाक्टर शिक्षकों की संख्या अपेक्षा से कम है, ऐसे में इस तरह के विवाद तो स्वाभाविक हैं. बावजूद इसके कालेज में रेगुलर क्लासेज चल रहे हैं. यहां के छात्रों के लिए हाल ही में कन्वोकेशन कराया गया है. साथ ही बाहर से अच्छे चिकित्सा शिक्षकों को बुलाकर छात्रों को उनके लेक्चर का लाभ दिलाया जा रहा है. उन्होंने बताया कि यहां एमबीबीएस में 50 सीटें रिकग्नाईज हैं, जिसे सौ सीटों तक कराने का प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि पीजी में यहां 54 सीटें हैं, जिनमें से 20 ही रिकग्नाईज हैं. डा. कुशवाहा ने कहा कि वे इसके लिए पुरजोर प्रयास कर रहे हैं कि मेडिकल कालेज एमसीआई के मानक पर खरा उतर जाए. इसके लिए उन्होंने अपने स्तर से संबंधित फोरम से पत्र-व्यवहार भी किया है. साथ ही मरीजों के हित को ध्यान में रखते हुए चौबीस घंटे लैब तथा एक्स-रे की सुविधा शुरु की गई है. मेडिकल कालेज के अस्पताल में डिजिटल एक्स-रे भी शुरु हो चुका है. मेडिसिन विभाग में पहले से ही आइसीयू था. इधर सभी विभागों में आईसीयू की सुविधा शुरु करने के साथ ही पीडियाट्रिक्स में आईसीयू की क्षमता का विस्तार कर दिया गया है. इंसेफेलाइटिस रोगियों के इलाज के लिए 300 बेड का वार्ड पहले से ही था, उसमें सौ बेड और बढ़ाया गया है. विकलांग बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था की गई है. ट्रामा सेंटर                बनकर तैयार है और उसके दो महीने के भीतर शुरु होने की संभावना है.
सरकार ने तोड़ी एम्स की उम्मीद
बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए केन्द्र सरकार जो छह नये एम्स खोलने का आगाज करने जा रही है, उसके अंदाज से पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों में व्यापक निराशा है. वैसे केन्द्र सरकार का यह तर्क तो समझ में आता है कि राजधानी नई दिल्ली स्थित एम्स में रोगियों की बढ़ रही भीड़ तथा देश के सुदूरवर्ती इलाकों के लोगों के लिए एम्स तक पहुंचाने के लिए ऐसा किया जाना निहायत जरूरी है. मगर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर जिस तरीके से पूर्वी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण शहर गोरखपुर में एम्स नहीं स्थापित होने दिया जा रहा है, उसे कत्तई ठीक नहीं माना जा सकता. हालांकि केन्द्र सरकार ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के घाव पर मरहम लगाने के लिए बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य से इसके लिए प्रस्ताव जरूर मांगा है, मगर उसके पीछे भी कुत्सित राजनीति की बू आ रही है. कहना न होगा कि 2004 में पारित हुए एम्स रेगुलेशन एक्ट में जिन आधारों पर किसी क्षेत्र विशेष में एम्स की स्थापना करने की बात केन्द्र सरकार कर रही है, उसमें कुल छह आधार नियत किये गए हैं. एक्ट के लिहाज से एम्स की स्थापना उन्हीं क्षेत्रों में होनी है, जहां नवजात बच्चों की मृत्यु दर, संक्रामक बीमारियों के प्रसार की दर, प्रसूता स्त्रियों की मृत्यु दर सर्वाधिक है तथा प्रति वर्ग किमी क्षेत्र में सरकारी अस्पतालों की संख्या, प्रति व्यक्ति आय तथा शिक्षा का स्तर सर्वाधिक कम है. इस लिहाज से देखा जाए तो यही मिलेगा कि पिछले 31 वर्षों के दरम्यान अकेले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में तकरीबन 42 हजार से ज्यादा बच्चों की मौतें हुईं हैं, जो आज भी जारी है. इतनी ज्यादा मौतें सुनामी जैसे तूफानी चक्रवात से भी नहीं हुई थीं. जहां तक संक्रामक बीमारियों के प्रसार के दर की बात है तो यह इलाका आज भीइंसेफेलाइटिस और डेंगू जैसे रोगों से कराह रहा है. शुरुआत से ही शैक्षिक स्तर में गिरावट का दंश झेल रहे इस इलाके में प्रसूता महिलाओं की मृत्यु दर भी देश के किसी भी हिस्से की तुलना में सर्वाधिक है. साथ ही यहां प्रति वर्ग किलोमीटर सरकारी अस्पताल 0.02 फीसदी हैं, जो किसी भी शरमाएदार केडूब मरने के लिए काफी है. औद्योगिक रूप से विपन्न उत्तर प्रदेश के इस इलाके में प्रति व्यक्ति

यह हैं ‘समृद्धी एमबीए सब्जी वाला

मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के बाद आप क्या करना चाहेंगे, विदेश में नौकरी या देश के किसी बड़ी कंपनी में अच्छी तनख्वाह पर काम या फिर आप सब्जी बेचना पसंद करेंगे. सब्जी बेचने की बात सुनकर आप चौंक तो नहीं गये, लेकिन अहमदाबाद के दो मैनेजमेंट डिग्री धारक कौशलेन्द्र और निर्मल कुमार ने पढाई करने के बाद सब्जी बेचना बेहतर समझा. यह काम वे किसी मजबूरी में नहीं बल्कि पेशेवर तौर पर करते हैं और इससे वे लाखों करोड़ो कमा रहे हैं . कौशलेन्द्र ने अपनी कंपनी का नाम ‘समृद्धी एमबीए सब्जी वाला रखा है . आज उनके साथ काम करने वालों की संख्या 300 हो गयी है . इन्होंने अपनी कंपनी से लगभग 6000 से ज्यादा किसान परिवारों को जोड़ रखा है . इस काम में पहले दिन उनकी कमाई 22 रु थी . तकरीबन तीन साल के बाद उनकी कमाई पांच करोड़ रुपये हो गयी है . बिहार के रहने वाले कौशलेन्द्र ने पढ़ाई खत्म करने के बाद सब्जी बेचना और इसे एक चेन की तरह बना कर ताजा सब्जी लोगों तक पहुंचाने का फैसला किया . अब इस व्यापार में उन्हें और अधिक संभावना नजर आ रही है . इसमें उनका साथ दे रहे हैं अहमदाबाद के रहने वाले निर्मल कुमार दोनों ने मिलकर धंधे में कई प्रयोग किये हैं जो सफल रहा है उनका कहना है कि वे किसानों को मुनाफे का ज्यादा हिस्सा देने का प्रयास कर रहे हैं . इसके लिए उन्होंने ऑनलाइन वेंचर खोलने का फैसला किया है जिसकी सहायता से अहमदाबाद के लोग खेत से ही ताजी सब्जी ऑनलाइन खरीद सकेंगे . पटना में एक छोटी सी दुकान से शुरू हुआ यह सफर अब एक बड़ी कंपनी का रूप ले चुका है .
एक और राजा राममोहन राय का इंतजार
आजादी के 65 साल बाद और विधवाओं को जीने का मूलभूत अधिकार दिलाने वाले सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम 1829 के 184 वर्ष गुजर जाने पर भी देश में विधवाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है. हालत यह है कि देश के तमाम धार्मिक स्थलों के आश्रमों में भारी संख्या में ये विधवाएं जीवन बसर करने को मजबूर है. इनकी बदहाली को देख केन्द्र सरकार भी स्वयं सेवी संस्थाओं के जरिये विधवा आश्रमों का संचलन करा रही है. बावजूद इसके इनकी स्थिति में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं दिखाई देता .  यही नहीं वृंदावन के आश्रमों में भजन गाने और सड़कों पर भीख मांगने वाली इन महिलाओं को आज एक और राजा राममोहन राय का इंतजार है. उच्चतम न्यायालय ने भी इनकी स्थिति को  संज्ञान में लिया है और 2012 में इनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक दल गठित किया . केंद्र सरकार ने भी हाल ही में राष्ट्रीय महिला आयोग को वृंदावन की विधवाओं की स्थिति का अध्ययन करने का निर्देश दिया है. स्वयंसेवी संस्थान गिल्ड ऑफ  सर्विसेज के सर्वेक्षण के मुताबिक वृंदावन में विधवाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, इनमें से कुछ तो घरवालों के दुत्कारे जाने के कारण यहां पहुंचीं, जबकि कुछ को दो वक्त की रोटी के लिए अपनों के आगे हाथ फैलाना पड़ा, तो वे इस जिल्लत से बचने के लिए वृंदावन पहुंच गईं . संस्थान की अध्यक्ष एवं राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष डा. मोहिनी गिरि ने कहा कि एक तरफ  तो हम देश में महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं दूसरी तरफ  देश में विधवाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है, उन्हें मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है. गैर सरकारी संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक वृंदावन की सड़कों पर 15 हजार से अधिक विधवाएं दयनीय स्थिति में जीने को मजबूर हैं. यहां के ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी बदतर है.

“We know the value of truth.”

Today, there is no dearth of newspaper and magazines in the market still we are coming to you with Poorva Star, a fortnightly magazine with the determination and forte, “We know the value of truth.” So the well deserved question is inevitable-WHY? To answer this question we would like to say, politics and media are the two major sources of mass dialogue among the citizens of any a democratic setup.

During the freedom movement both the pillars of democracy made supreme sacrifice while working under the mission of freedom. This situation more or less prevailed till 1985. Through this mission media successfully fought the government censorship and tackled Jagganath Mishra’s Press Bill. However, in later days, the reliability of media and politics was marred by the commercialization. We were not even able to protect the status of Fourth Estate of democracy with all morality and ethics. Today, we have reached the level where the image of media has become so murkier, this is the same dark side of media which was being exposed from the field of politics and administration. Nowadays, we are getting the news of media persons being arrested and being jailed with the charges of alleged corruption.

In addition to this, due to cut throat competition and commercialization media started losing its National Identity and started adopting regional face. This created iron curtain for regional news and reader from one region do not have access towards the news of another region. This has fatal impact on the national unity and nationalistic feeling.

In such situation, the publication of Poorva Star is a small effort which in the direction of Nationalistic & positive feeling which will set aside the existing evils of media. We are fully aware that media is suffering from the syndrome of bloating its own trumpet and liaisoning and we may have to pay a price for that.

Still, we are ready to pay that price and we are com0ing to you with the determination of building and developing the integrity and overall development. This is the reason we have adopted the ‘tagline’, “We Know the Value of Truth.” For this, we need the support of your love, goodwill and co-operation.