एजूकेशनल हब बन रहा गोरखपुर

वर्तानियां हुकूमत के दौर से लेकर अब तक औद्योगिक पिछड़ेपन का दंश झेल रहे पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रमुख शहर गोरखपुर अपनी जिजीविषा के बूते बड़ी तेजी से शैक्षणिक केन्द्र(एजूकेशनल हब) के रूप में उभर रहा है. सन् 1952 तक जिस शहर में मात्र एक महाविद्यालय था, वहीं बासठ वर्षों के अन्तराल में शिक्षा के क्षेत्र में इस शहर ने उल्लेखनीय प्रगति की है. यह शहर आज की तारीख में सूबे के शैक्षणिक केन्द्र इलाहाबाद, वाराणसी, कानपुर तथा राजधानी लखनऊ के समक्ष सीना तान कर खड़ा है. यहां पेश है वीरेन्द्र मिश्र दीपक की रिपोर्ट….
पूर्वी उत्तर प्रदेश की शैक्षिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक राजधानी कहा जाना वाला गोरखपुर शहर खासकर शिक्षा का बड़ा केन्द्र होने की ओर अग्रसर है. सन् 1952 में जब गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, तब इस शहर में उच्च शिक्षा के लिए एकमात्र महाविद्यालय सेन्ट एन्ड्रयूज डिग्री कालेज था, जो आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध था. इसके अलावा तत्कालीन गोरखपुर मंडल में गिने-चुने ही उच्च शिक्षा के लिए शिक्षण संस्थाएं थीं. विश्वविद्यालय  स्थापित होने के बाद आज की तारीख में दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से 354 डिग्री कालेज संबद्ध हैं. इनमें 31 अनुदानित तथा 13 राजकीय महाविद्यालय हैं. बीआरडी मेडिकल कालेज घटक के रूप में इस विश्वविद्यालय से संबद्ध है. विश्वविद्यालय पर उत्तरोत्तर बढ़ रहे कार्य बोझ और इस इलाके के प्रतिभा पलायन पर रोक लगाने के लिए इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग काफी जोर-शोर से हो रही है. केन्द्र सरकार ने जनहित में यदि इस मांग को मान लिया तो वह दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. शहर का मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज भी पहले इसी विश्वविद्यालय से संबद्ध था,जो बाद में टेक्निकल विश्वविद्यालय से संबद्ध हो गया. उत्तर प्रदेश सरकार ने 2013-14 के बजट में इस इंजीनियरिंग कालेज को भी रुड़की टेक्निकल विश्वविद्यालय की तरह विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा की है. प्रदेश सरकार इस कोशिश में है कि आगामी शैक्षणिक सत्र से ही इस विश्वविद्यालय को औपचारिक रूप से शुरु कर दिया जाए. इसके लिए जरूरी औपचारिकता पूरी करने का कार्य काफी तेजी से हो रहा है. इंजीनियरिंग कालेज के विश्वविद्यालय बनते ही गोरखपुर की धरती को जहां दो-दो विश्वविद्यालयों की मल्लिका बनने का गौरव हासिल होगा, वहीं इस क्षेत्र के विकास को पंख लगने में देर नहीं लगेगी. यहां एक और बात काबिल-ए-गौर है कि बीआरडी मेडिकल कालेज को एम्स का दर्जा दिलाने का प्रस्ताव भी केन्द्र सरकार को भेजा जा चुका है. क्षेत्रीय जनता का यह भी सपना साकार हो गया तो क्या कहने? यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गोरखपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध 309 डिग्री कालेज ऐसे हैं, जो स्व वित्त पोषित आधार पर चल रहे हैं. जहां तक गोरखपुर शहर की बात है, यहां सेन्ट एन्ड्रयूज डिग्री कालेज, डीएवी डिग्री कालेज, इमामबाड़ा डिग्री कालेज, एम. जी. डिग्री कालेज और दिग्विजय नाथ डिग्री कालेज को मिलाकर कुल पांच महाविद्यालय अनुदानित हैं. इसके अलावा गोरखपुर शहर और इसके आसपास के इलाकों में 13 स्व वित्त पोषित डिग्री कालेजों के जरिए शिक्षा की अलख विश्वविद्यालय जगा रहा है. तकरीबन पांच हजार छात्र संख्या से अपनी शैक्षणिक यात्रा शुरु करने वाले इस विश्वविद्यालय में आज यूपी, बिहार, नेपाल तथा समीपवर्ती जिलों के बीस हजार से ज्यादा छात्र अध्ययन कर रहे हैं. अपने 25 विभागों में बेहतर पढ़ाई के जरिये गोरखपुर विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रमों और नियमित शैक्षणिक सत्र की वजह से उत्तरोत्तर विकास कर रहा है.
सन् 1952 में जब गोरखपुर में विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई तो तत्कालीन केन्द्र सरकार के मुखिया पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे ग्रामीण विश्वविद्यालय की संज्ञा देते हुए कहा था कि यह विश्वविद्यालय पूर्वी उत्तर प्रदेश के शैक्षिक जगत में मील का पत्थर साबित होगा. उन्होंने इस क्षेत्र की जरूरत को महसूस करते हुए आश्वस्त किया था कि पचास वर्ष के बाद इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय बना दिया जाएगा. इसके बाद केन्द्र और राज्य में तमाम सरकारें आईं और गईं, मगर किसी ने भी इस जनोपयोगी मसले पर अमल को कौन कहे, विचार तक करने की जरूरत नहीं समझी. इसके लिए नक्कारखाने में तूती की तरह दब चुकी गोरखपुर की आवाज को सबसे पहले 25-11-2011 को विश्वविद्यालय के ललित कला एवं संगीत विभाग के अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार ने स्वर दिया. उन्होंने इस ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनी तरह का एक अनूठा आंदोलन छेड़ा. उन्होंने सूर्योदय से सूर्यास्त तक अनवरत पेंटिंग बनाकर लोगों को इस मुहिम से जोडऩे का जो प्रयास किया, उसकी जितनी भी सराहना की जाए कम है. इसी के साथ विश्वविद्यालय के शिक्षकों-कर्मचारियों ने एकजुट होकर व्यापक हस्ताक्षर अभियान चलाया, जिसमें शामिल होकर 21 सौ ज्यादा लोगों ने केन्द्रीय विश्वविद्यालय की मांग के पक्ष में हस्ताक्षर किए. शिक्षकों-कर्मचारियों और दिनोदिन बढ़ रहे जन दबाव की वजह से विश्वविद्यालय की कार्य परिषद और विद्या परिषद ने प्रस्ताव पारित कर प्रदेश तथा केन्द्र सरकार के कई फोरमों पर विचार और कार्यवाही के लिए भेजा, फिर भी कोई हल नहीं निकला.
प्रारंभिक तौर पर यह प्रो. मनोज कुमार द्वारा जगाए गए अलख का ही कमाल था कि कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष डा. वी. एन. सिंह तथा पूर्व अध्यक्ष रामेश्वर पाण्डेय, पूर्व उपाध्यक्ष फणेश तिवारी एवं पूर्व महामंत्री महेन्द्र नाथ सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय कर्मचारियों के एक जत्थे ने 9 जुलाई 2012 को नई दिल्ली जाकर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से मुलाकात करके अपना मांग पत्र उन्हें सौंपा. बताया तो यहां तक जा रहा है कि राहुल गांधी ने इस मांग पत्र को मानव संसाधन विकास मंत्रालय को विचारार्थ भेजा, जहां से उसे योजना आयोग भेजा जा चुका है. वहीं इस संदर्भ में बातचीत के दौरान प्रो. मनोज कुमार ने बताया कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय के मसले पर योजना आयोग में बैठक हुई, जिसमें आयोग का रुख काफी सकारात्मक रहा. आयोग ने इस मांग के संदर्भ में फिलहाल इतना कहा कि विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय जैसी सुविधा तो दी जा सकती है, लेकिन अभी उसे इस नाम से नवाज पाना थोड़ा मुश्किल है. प्रो. मनोज कुमार इसे इस विश्वविद्यालय के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि करार देते हुए कहते हैं कि यह केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने की ओर बढ़े कदम का एक पड़ाव है. उनका मानना है कि अब मंजिल दूर नहीं है. गोरखपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने को लेकर भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ तथा डुमरियागंज के कांग्रेस सांसद जगदंबिका पाल ने कम प्रयास नहीं किया. योगी जी ने संसद में इस मसले को तीन-तीन बार उठाकर सरकार से जवाब मांगा, वहीं जगदंबिका पाल ने दिनांक 12-11-11 को अपनी ही सरकार पर दबाव बनाते हुए कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश को शैक्षिक पिछड़ेपन से उबारने के लिए इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देना निहायत जरूरी है. इसके अलावा विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी इस मामले का मांग पत्र सोनिया गांधी के अलावा केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और जितिन प्रसाद, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भी सौंप चुके हैं. कर्मचारी नेता रामेश्वर पाण्डेय का कहना है कि वे होली के बाद इस मसले पर छात्र संघ के पूर्व और वर्तमान पदाधिकारियों, शिक्षकों और शिक्षक नेताओं तथा कर्मचारी संघ के नेताओं की साझा बैठक में अगली रणनीति पर विचार करेंगे. उन्होंने कहा कि चालू वर्ष में विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा दिलाने के लिए चरणबद्ध आंदोलन चलाया जाएगा. इसके तहत सभी माननीय सांसदों-विधायकों को पत्र भेजने, धरना, जनसभाओं के जरिए लोगों को जागरूक करने, मांग नहीं माने जाने पर काली पट्टी बांधकर विरोध जताने तथा मशाल जुलूस निकालने के कार्यक्रम होंगे, जिसे संघ की नई कार्यकारिणी के पदाधिकारियों ने नेतृत्व में अंजाम तक पहुंचाया जाएगा. कर्मचारी नेताओं का कहना है कि यह मुद्दा शिक्षकों-कर्मचारियों के साथ ही क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ा है. इसे हासिल किए बगैर चैन से नहीं बैठना है.
केन्द्रीय विश्वविद्यालय         से क्या होगा फायदा?
दीनदयाल गोरखपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने को लेकर विगत दो वर्षों से जो जद्दोजहद चल रही है. यहां सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश के अति पिछड़े इलाके में स्थापित उच्च शिक्षा का यह महत्वपूर्ण केन्द्र यदि केन्द्रीय विश्वविद्यालय के नाम से नवाज दिया जाता है, तो उससे फायदा क्या मिलेगा? इस संबंध में बातचीत के दरम्यान विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष रामेश्वर पाण्डेय एवं डा. वी. एन. सिंह देवरिया के भाटपार रानी उपनगर का हवाला देते हुए कहते हैं कि जब तक वहां महाविद्यालय नहीं खुला था, तब तक उस उपनगर का कोई खास विकास नहीं हुआ था. महाविद्यालय खुलने के बाद वहां हुए विकास इस मामले में किसी की भी आंख खोलने के लिए काफी है.
कर्मचारी नेताओं ने कहा कि यह सही है कि विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतनमान का निर्धारण केन्द्र सरकार द्वारा गठित वेतन आयोग करता है और उसी की सिफारिश पर राज्य सरकार अपने अधीनस्थ विश्वविद्यालय के शिक्षकों-कर्मचारियों को वेतन भुगतान करती है. केन्द्र द्वारा संस्तुत वेतनमान के हिसाब से वेतन आहरित कर पाने में कर्मचारियों के हाथ में अक्सर निराशा इसलिए लगती है, क्योंकि केन्द्र सरकार संस्तुत वेतनमान का आधा हिस्सा राज्य सरकार को तभी मुहैया कराती है, जब राज्य सरकार अपने हिस्से का धन वेतन मद में आवंटित कर देती है. ऐसे में राज्य और केन्द्र की राजनीतिक चक्की में राज्याधीन विश्वविद्यालय के कर्मचारी और शिक्षक दोनों पिस रहे हैं, जिसका कोई पुरसाहाल नहीं है. इन नेताओं का कहना है केन्द्रीय विश्वविद्यालय बन जाने से इस समस्या से निजात मिल जाएगी. साथ ही केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने के साथ ही इस इलाके को एक और मेडिकल कालेज मिल जाएगा, जिससे संक्रामक बीमारियों से सर्वाधिक तबाह रहने वाले पूर्वांचल को काफी राहत मिलेगी. ललित कला एवं संगीत विभाग के अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार ने इस बारे में पूछने पर बताया कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय बन जाने पर सर्वाधिक फायदा यहां के छात्रों को मिलेगा. उनकी फीस करीब-करीब आधी हो जाएगी, साथ ही तमाम तरह के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई शुरु होने से युवाओं को रोजगार के लाले नहीं रहेंगे. प्रो. मनोज कुमार कहते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में मेधा की कमी नहीं है. कमी है, तो बस उन्हें संवारने की. केन्द्रीय विश्वविद्यालय बन जाने पर इलाके के जो मेधावी छात्र बाहर जाकर अपना भविष्य संवारते हैं, उस पर रोक लगेगी और प्रतिभाओं का पलायन रुकेगा.
मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज, गोरखपुर
मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज, गोरखपुर के प्राचार्य जे.पी. सैनी प्रदेश के बजट में कालेज को विश्वविद्यालय बनाए जाने की घोषणा से अत्यन्त प्रसन्न हैं. बातचीत के दौरान वे कहते हैं कि ऐसा पहली बार मैने देखा है, जब किसी मुख्यमंत्री ने दलगत भावना से ऊपर उठकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की पीड़ा से खुद को जोड़ा है. वह कहते हैं कि तकनीक ऐसी चीज है, जिससे किसी भी समस्या का समाधान मिल सकता है. उत्तर प्रदेश के विकास में रुड़की विश्वविद्यालय का अमूल्य योगदान रहा है. रेजीडेंशियल रूप से इस कालेज के विश्वविद्यालय बन जाने के बाद एग्रीकल्चर, सुगर, एनवायरमेंट, केमिकल, आर्किटेक्चर, टाउन प्लानिंग तथा बायोलोजिकल सेक्टर में जो काम होंगे, उससे पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास को पंख लग जाएंगे. साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश की तमाम प्रतिभाएं, जो अध्ययन के लिए बाहर जा रही हैं, यहीं रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण करके देश की सेवा कर सकेंगी. डा. सैनी का कहना है कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय टेक्निकल कन्सल्टेंसी के रूप में सूबे के लिए कुछ सार्थक कर पाए, हमारा यही प्रयास रहेगा. इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए टेक्निकल इनपुट दिलाना हमारी प्राथमिकता में होगा.
अपनी बातचीत को विस्तार देते हुए क्यूबा जैसे छोटे देश का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि वहां की अर्थव्यवस्था में गन्ने की फसल का काफी महत्वपूर्ण योगदान है. पूर्वी उत्तर प्रदेश, जिसे चीनी का कटोरा कहा जाता है, उसके क्षेत्रफल से भी छोटा है क्यूबा. पूर्वी उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल की जो दुर्गति है, वह किसी से छिपी नहीं है. यह विश्वविद्यालय सुगर टेक्नालाजी के क्षेत्र में न केवल नये मानदंड स्थापित करेगा, बल्कि नई तकनीक के जरिये इस क्षेत्र को क्यूबा की बराबरी पर लाने की हरसंभव कोशिश करेगा, जिसका सीधा लाभ हमारे किसानों को होगा.
   विश्वविद्यालय बनाने की वाबत पूछे गए एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इसके लिए जो अधिनियम पास होना है, उसका ड्राफ्ट प्रमुख सचिव प्राविधिक शिक्षा को भेज दिया गया है. उम्मीद है कि आगामी जून माह से पहले ही अधिनियम का अनुमोदन हो जाएगा. इसी के साथ आगामी सत्र से यह कालेज विश्वविद्यालय के रूप में कार्य करने लगेगा. उन्होंने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जो खुद भी इंजीनियर हैं, विशेष रुचि लेकर इस कार्य की मानीटरिंग कर रहे हैं. एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए नौ सौ करोड़ का प्लान बनाकर भेजा गया है. नये विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 450 पद होंगे. अगले दस वर्षों के दरम्यान रुड़की विश्वविद्यालय की तरह यहां कुल सत्रह विभागों की पढ़ाई शुरु हो जाएगी. कालेज के पास अभी सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रानिक्स एंड सिविल इंजीनियरिंग, मकैनिकल इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग समेत कुल पांच विभाग ही हैं. कालेज में इस समय बीटेक में 1350 और एमटेक में 350 छात्र अध्ययनरत हैं. विश्वविद्यालय खुल जाने के उपरान्त बीटेक में 6000 तथा एमटेक में 800 छात्र हो जाएंगे. डा. सैनी ने विश्वास जताया कि यह विश्वविद्यालय देश के नवनिर्माण में अपनी उल्लेखनीय भूमिका पूरी जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ निभाएगा.
बीआरडी मेडिकल कालेज
बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. के.पी. कुशवाहा ने मेडिकल कालेज को एम्स का दर्जा देने के लिए सवा दो सौ करोड़ का प्रस्ताव बनाकर प्रधानमंत्री को भेजा है. उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली स्थित आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट पर बढ़ रहे मरीजों के बोझ को कम करने तथा देश के सुदूरवर्ती इलाकों के लोगों को भी एम्स की चिकित्सा सुविधा का लाभ दिलाने के लिए छह नये एम्स खोलने का मन बनाया है,जिन्हें तीन चरणों में स्थापित करने की योजना है. डाक्टर कुशवाहा ने बताया कि मेडिकल कालेज में 100 सीटों वाले नर्सिंग स्कूल खोलने का भी प्रस्ताव भेजा गया है, जिसे विश्वविद्यालय से पास होने और उसके लिए जरूरी पदों के अनुमोदन के साथ ही उसकी भी पढ़ाई शुरु हो जाएगी. अक्सर मेडिकल कालेज की मान्यता को लेकर पैदा होने वाले विवाद की वाबत पूछे गए सवाल के जवाब में डा. कुशवाहा ने कहा कि कालेज में डाक्टर शिक्षकों की संख्या अपेक्षा से कम है, ऐसे में इस तरह के विवाद तो स्वाभाविक हैं. बावजूद इसके कालेज में रेगुलर क्लासेज चल रहे हैं. यहां के छात्रों के लिए हाल ही में कन्वोकेशन कराया गया है. साथ ही बाहर से अच्छे चिकित्सा शिक्षकों को बुलाकर छात्रों को उनके लेक्चर का लाभ दिलाया जा रहा है. उन्होंने बताया कि यहां एमबीबीएस में 50 सीटें रिकग्नाईज हैं, जिसे सौ सीटों तक कराने का प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि पीजी में यहां 54 सीटें हैं, जिनमें से 20 ही रिकग्नाईज हैं. डा. कुशवाहा ने कहा कि वे इसके लिए पुरजोर प्रयास कर रहे हैं कि मेडिकल कालेज एमसीआई के मानक पर खरा उतर जाए. इसके लिए उन्होंने अपने स्तर से संबंधित फोरम से पत्र-व्यवहार भी किया है. साथ ही मरीजों के हित को ध्यान में रखते हुए चौबीस घंटे लैब तथा एक्स-रे की सुविधा शुरु की गई है. मेडिकल कालेज के अस्पताल में डिजिटल एक्स-रे भी शुरु हो चुका है. मेडिसिन विभाग में पहले से ही आइसीयू था. इधर सभी विभागों में आईसीयू की सुविधा शुरु करने के साथ ही पीडियाट्रिक्स में आईसीयू की क्षमता का विस्तार कर दिया गया है. इंसेफेलाइटिस रोगियों के इलाज के लिए 300 बेड का वार्ड पहले से ही था, उसमें सौ बेड और बढ़ाया गया है. विकलांग बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था की गई है. ट्रामा सेंटर                बनकर तैयार है और उसके दो महीने के भीतर शुरु होने की संभावना है.
सरकार ने तोड़ी एम्स की उम्मीद
बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए केन्द्र सरकार जो छह नये एम्स खोलने का आगाज करने जा रही है, उसके अंदाज से पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों में व्यापक निराशा है. वैसे केन्द्र सरकार का यह तर्क तो समझ में आता है कि राजधानी नई दिल्ली स्थित एम्स में रोगियों की बढ़ रही भीड़ तथा देश के सुदूरवर्ती इलाकों के लोगों के लिए एम्स तक पहुंचाने के लिए ऐसा किया जाना निहायत जरूरी है. मगर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर जिस तरीके से पूर्वी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण शहर गोरखपुर में एम्स नहीं स्थापित होने दिया जा रहा है, उसे कत्तई ठीक नहीं माना जा सकता. हालांकि केन्द्र सरकार ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के घाव पर मरहम लगाने के लिए बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य से इसके लिए प्रस्ताव जरूर मांगा है, मगर उसके पीछे भी कुत्सित राजनीति की बू आ रही है. कहना न होगा कि 2004 में पारित हुए एम्स रेगुलेशन एक्ट में जिन आधारों पर किसी क्षेत्र विशेष में एम्स की स्थापना करने की बात केन्द्र सरकार कर रही है, उसमें कुल छह आधार नियत किये गए हैं. एक्ट के लिहाज से एम्स की स्थापना उन्हीं क्षेत्रों में होनी है, जहां नवजात बच्चों की मृत्यु दर, संक्रामक बीमारियों के प्रसार की दर, प्रसूता स्त्रियों की मृत्यु दर सर्वाधिक है तथा प्रति वर्ग किमी क्षेत्र में सरकारी अस्पतालों की संख्या, प्रति व्यक्ति आय तथा शिक्षा का स्तर सर्वाधिक कम है. इस लिहाज से देखा जाए तो यही मिलेगा कि पिछले 31 वर्षों के दरम्यान अकेले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में तकरीबन 42 हजार से ज्यादा बच्चों की मौतें हुईं हैं, जो आज भी जारी है. इतनी ज्यादा मौतें सुनामी जैसे तूफानी चक्रवात से भी नहीं हुई थीं. जहां तक संक्रामक बीमारियों के प्रसार के दर की बात है तो यह इलाका आज भीइंसेफेलाइटिस और डेंगू जैसे रोगों से कराह रहा है. शुरुआत से ही शैक्षिक स्तर में गिरावट का दंश झेल रहे इस इलाके में प्रसूता महिलाओं की मृत्यु दर भी देश के किसी भी हिस्से की तुलना में सर्वाधिक है. साथ ही यहां प्रति वर्ग किलोमीटर सरकारी अस्पताल 0.02 फीसदी हैं, जो किसी भी शरमाएदार केडूब मरने के लिए काफी है. औद्योगिक रूप से विपन्न उत्तर प्रदेश के इस इलाके में प्रति व्यक्ति

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